Hindi Short Story and Hindi Moral Story on “Gandhari ka Shrap, Shri Krishan ka Shrap Sawikarna” , “गाँधारी का श्राप, श्रीकृष्ण का श्राप स्वीकारना” Complete Hindi Prernadayak Story for Class 9, Class 10 and Class 12.

गाँधारी का श्राप, श्रीकृष्ण का श्राप स्वीकारना

Gandhari ka Shrap, Shri Krishan ka Shrap Sawikarna

 

 

दुर्योधन के अंत के साथ ही महाभारत के महायुद्ध का भी अंत हो गया । माता गाँधारी दुर्योधन के शव के पास खडी फफक-फफक कर रो रही हैं । पुत्र वियोग में “गाँधारी का भगवान कृष्ण को श्राप देना, भगवान कृष्ण का श्राप को स्वीकार करना और गाँधारी का पश्चताप करना” । इसका बडा ही मार्मिक वर्णन किया है धर्मवीर भारती जी ने (गीता-कविता से संकलित)

गाँधारी: ह्र्दय विदारक स्वर में

तो वह पडा है कंकाल मेरे पुत्र का

किया है यह सब कुछ कृष्ण

तुमने किया है सब

सुनो

आज तुम भी सुनो

मैं तपस्विनी गाँधारी

अपने सारे जीवन के पुण्यों का

बल ले कर कहती हूँ

कृष्ण सुनो

तुम अगर चाहते तो रूक सकता था युद्द यह

मैंने प्रसव नहीं किया था कंकाल वह

इंगित पर तुम्हारे ही भीम ने अधर्म किया

क्यों नहीं तुमने यह शाप दिया भीम को

जो तुमने दिया अश्वत्थामा को

तुमने किया है प्रभुता का दुरूपयोग

यदि मेरी सेवा में बल है

संचित तप में धर्म है

प्रभु हो या परात्पर हो

कुछ भी हो

सारा तुम्हारा वंश

इसी तरह पागल कुत्तों की तरह

एक दूसरे को परस्पर फाड खायेगा

तुम खुद उनका विनाश कर के कई वर्षों बाद

किसी घने जंगल में

साधारण व्याध के हाथों मारे जाओगे

प्रभु हो पर मारे जाओगे पशु की तरह

वंशी ध्वनि: कृष्ण की आवाज

कृष्ण ध्वनि:

प्रभु हूँ या परात्पर

पर पुत्र हूँ तुम्हारा तुम माता हो

मैंने अर्जुन से कहा

सारे तुम्हारे कर्मों का पाप पुण्य योगक्षेम

मैं वहन करूँगा अपने कंधों पर

अट्ठारह दिनों के इस भीषण संग्राम में

कोई नहीं केवल मैं ही मरा हूँ करोडों बार

जितनी बार जो भी सैनिक भूमिशायी हुआ

कोई नहीं था

मैं ही था

गिरता था जो घायल हो कर रणभूमि में

अश्वत्थामा के अंगों से

रक्त पीप स्वेद बन कर बहूँगा

मैं ही युग युगांतर तक

जीवन हूँ मैं

तो मृत्यु भी मैं ही हूँ माँ

श्राप यह तुम्हारा स्वीकार है

गाँधारी:

यह क्या किया तुमने

फूट कर रोने लगती है

कोई नहीं में अपने

सौ पुत्रों के लिये

लेकिन कृष्ण तुम पर

मेरी ममता अगाध है

कर देते श्राप मेरा तुम अस्वीकार

तो क्या मुझे दु:ख होता?

मैं थी निराश मैं कटु थी

पुत्रहीन थी

कृष्ण ध्वनि:

ऐसा मत कहो माता जब तक मैं जीवित हूँ पुत्रहीन नहीं हो तुम प्रभु हूँ या परात्पर पर पुत्र हूँ तुम्हारा तुम माता हो

 

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