Hindi Poem of Pratibha Saksena “  Log”,” लोग” Complete Poem for Class 9, Class 10 and Class 12

लोग

 Log

 

आज फिर एक डायन ,

बाँसों से खदेड़-खदेड़ यातनायें दे ,

मौत के घाट उतार दी गई  ।

इकट्ठे हुये थे लोग

यंत्रणाओं से तड़पती

नारी देह का मज़ा लेने!

खा गई पति को ,

राँड है!

जादू-टोना करती चाट जाती बच्चों को ,

नज़र लगा कर ,चौपट करदे जिसे चाहे ,

.काली जीभ के कुबोल इसी के!

अकेली नारी!

बेबस ,असहाय!

कौन सुने उसकी?

कहीं , कोई नहीं!

कोंच रहे हैं अंग-प्रत्यंग,

जितना दारुण यातना ,

उतनी ऊँची किलकारियाँ!

ख़ून से लथपथ,

मर्मान्तक पीड़ा से

ऐंठता शरीर ठेल-ठेल , 

ठहाके लगाते लोग!

उन्मादग्रस्त भीड़

अकेली औरत!

बदहवास भागती है!

जायेगी कहाँ!

कहाँ जायगी, डायन?

दर्दीली चीखों से रोमांचित-उत्त्तेजित

पत्थर फेंक-फेंक  हुमस रहे लोग!

प्राणान्तक यंत्रणायें देते

असह्य आनन्द से

किलकारियाँ मारते  लोग!

कौन सी नई बात!

सदियों से हर बरस

यही लीला देखने

इकट्ठा होते हैं -बड़े चाव से लोग !

वही पुरानी कथा –

आती है एक नारी,

स्वयं -प्रार्थिता ,

नारीत्व की सार्थकता हेतु ,

पुरुष की कामना लिये!

और शुरू होता है तमाशा! 

प्रर्थिता को  एक दूसरे के पास फेर रहे

कंदुक सा बार-बार!

(पुरुष कहाँ अकेला ,

सब साथ होते हैं उसके!)

हो गई विमूढ़ , हास्य-पात्र ,

स्वयं-प्रार्थिता!

और  तिरस्कार की असह व्यथा!

लोग रस विभोर!

उठ रहा है रोर!

क्रोध -औ’विरोध !

कटु वचनों के कशाघात!

और फिर पौरुष का वार

अंग-भंग कर किया संपन्न महत्-कार्य!

उठी जय कार !

समवेत अट्टहास!

मुख विवर्ण -विकृत ,लिखी पीड़ा अपार

ऐंठता-सा  देह का आकार!

ठहाके लगाते लोग!

रक्त-धारायें बहाता तन ,

घोर चीत्कार करती ,

भागती है वह!

आनन्द से हुलसते ,

नाच उठते हैं लोग!

सदियों से साल-दर साल

यही मनोरंजन होता आया है ,

उत्सव यही देखने

अब भी तो आते हैं ,

वीभत्स आनन्द के प्यासे लोग

 

 

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