Hindi Poem of Divik Ramesh “Dant”,”दाँत” Complete Poem for Class 9, Class 10 and Class 12

दाँत

 Dant

ख़बर है कि नहीं रहा एक अगला दाँत कवि त्रिलोचन का

न हुआ पर न हुआ अफ़सोस मीर का नसीब

सामने साक्षात् थे वासुदेव, कि न चल सका ज़ोर, यूँ मारा बहुत था ।

भाई, बाकी तो सब सलामत हैं, बेकार था, सो गया, अफ़सोस क्या?

सुनो, शोभा के लिए अधिक होते हैं ये अगले दाँत, और भाई

त्रिलोचन और शोभा! ऊँह! वहाँ दिल्ली का क्या हाल है?

सर्दियों में खासी कटखनी होती है सर्दी ।

कहूँ, यूँ तो वार दूँ दुनिया की तमाम शोभा आप पर

तो भी लगवा लें तो हर्ज ही क्या है, त्रिलोचन जी!

नकली? जो मिलता है, उँह, यानी वेतन

या तो दाँत ही लगवा लूँ या फिर भोजन जुटा लूँ, महीने-भर का।

वेतन!

पर आप तो पाते हैं प्रोफेसर का!

ऐसा,

तो मैं चुप हूँ भाई

त्रिलोचन भीख तो नहीं माँगेगा ।

चुप ही रहा ।

ग़नीमत थी, नहीं मिली थी उपाधि उजबक की ।

क्या सच में शोभा के लिए होता है अगला दाँत, महज

और इसीलिए बेकार भी

कहा, काटने के भी तो काम आता है त्रिलोचन जी!

रहता तो काटने में सुविधा तो रही होती न?

ठीक कहा, त्रिलोचन हँसे — मुस्कराने की शैली में —

तुम उजबक हो

काटने को चाकू होता है ।

अजीब उजबक था मैं भी

त्रिलोचन और काटना!

आता काटना तो क्या कटे होते चिरानीपट्टी से

क्या कटे होते हर वहाँ से

जहाँ-जहाँ से काटा जाता रहा है उन्हें!

नहीं जानता त्रिलोचन सहमत होते या नहीं इस बात पर

सो सोच कर रहा गया

और सपने को सपना समझ कर भूल गया

हालाँकि निष्कर्ष मेरे हाथ था

त्रिलोचन और काटना!

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