Hindi Poem of Prabhar Machve “ Rahi se”,”राही से” Complete Poem for Class 9, Class 10 and Class 12

राही से

 Rahi se

 

इस मुसाफ़िरी का कुछ न ठिकाना भइया!

याँ हार बन गया अदना दाना, भइया ।

है पता न कितनी और दूर है मंज़िल

हम ने तो जाना केवल जाना, भइया!

तकरार न करना जाना है एकाकी

हमराह बचेगा कौन भला अब बाक़ी

जब सम्बल भी सब एक-एक कर छुटता

बस बची एक झाँकी उन नक़्शे-पा की ।

छूट चले राह में नए-पुराने साथी

मिट गई मार्गदर्शक यह कम्पित बाती

नंगी प्रकृति वीरान भयावह आगे

मैं जाता हूँ, आओ, हो जिस की छाती!

 

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