Hindi Poem of Ashniv Singh Chaohan “  Tukda kagaz ka “ , “टुकड़ा काग़ज़ का” Complete Poem for Class 9, Class 10 and Class 12

टुकड़ा काग़ज़ का

 Tukda kagaz ka

 

उड़ता जाए

टुकड़ा कागज़ का

कभी पेट की चोटों को

आँखों में भर लाता

कभी अकेले में

भीतर की

टीसों को गाता

अंदर-अंदर

लुटता जाए

टुकड़ा कागज़ का

कभी फ़सादों-बहसों में

है शब्द-शब्द उलझा

दरके-दरके

शीशे में

चेहरा बाँचा-समझा

सिद्धजनों पर

हँसता जाए

टुकड़ा कागज़ का

कभी कोयले-सा धधका,

फिर राख बना, रोया

माटी में मिल गया

कि जैसे

माटी में सोया

चलता है हल

गुड़ता जाए

टुकड़ा कागज़ का

 

 

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