Hindi Poem of Shriprakash Shukal “  Ret me kalakar”,”रेत में कलाकार” Complete Poem for Class 9, Class 10 and Class 12

रेत में कलाकार

 Ret me kalakar

 

बालू के कण कण साथ ले चलो उड़ जा हारिल की नाईं

सुबह हुई अब सपने छूटे उठ जा हरकारे की ठाईं।

ठोक पीटकर आकृति दे दो बांधो नदी नाव की खाईं

जग जीतो सब लहरें गिन लो कर लो तट को वश में साईं ।

तेरे हाथों में है ताकत बढ़ो सृजन पथ माथ न दो

तेरी मुटठी में दुनिया है बाधो हाथ विराम न दो ।

बालू गंगा का स्वरुप है गंगा क्या इतनी-सी, पर है

बालू बालू में प्रवाह को किसने धारा दी, जी भर है ।

लेाग रहेंगे आते-जाते तन भर तुझको देखेंगे

उठते-गिरते जो संभलेंगे मन भर तुमको भेटेंगें ।

इस या उस की बात नहीं है हर आकृति में तेरा बल है

जो दुनिया से चलकर जाता तेरी नज़रों की हलचल है ।

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