Hindi Poem of Shriprakash Shukal “  Ret me aatritiya”,”रेत में आकृतियाँ” Complete Poem for Class 9, Class 10 and Class 12

रेत में आकृतियाँ

 Ret me aatritiya

 

गंगापार

छाटपार

आकाश में सरकता सूरज

जिस समय गंगा के ठीक वक्ष पर चमक रहा था

बालू को बांधने की हरकत में

कलाकारों का अनंत आकाश

धरती पर उतरने की कोशिश कर रहा था

धरती

जिस पर आकाश से गिराये गये बमेां की गंूज थी

जहां अभी अभी सद्दाम को फांसी दी गयी थी

जहां निठारी कांड से निकलने वाले मासूम खून के धब्बे

अभी सूखे भी नहीं थे

काशी के कलाकारों ने अपनी आकृतियों में

एक रंग भरने की कोशिश की थी

लगभग नीला रंग

इस रंग में छाहीं से लेकर निठारी तक का ढंग था

अस्सी से लेकर मणिकर्णिका तक की चाल थी 

सीवर से लेकर सीवन तक का प्रवाह था

मेढक से लेकर मगरमच्छ तक की आवाजाही थी

यहां रेत में उभरी आकृतियों के बीच

हर कोई ढूंढ रहा था अपनी आकृति

और हर कोई भागता था अपनी ही आकृति से

यहां सब था

और सबके वावजूद बहुत कुछ ऐसा था

जो वहां नहीं था

जिसे कलाकारों की आंखों में देखा जा सकता था

आंखें जो नदी के तल जैसी गहरी और उदास थी

जिसमें गंगोत्री से लेकर गंगासागर तक का विस्तार था

जहां स्वर्ग की इच्छा से अधिक नरक की मर्यादा थी

यह मकर संक्राति के विल्कुल पास का समय था

जहां यह पार उदास था

तो वह पार गुलजार

इस पार सन्नाटा था

उस पार शोर

आज इस सन्नाटे में एक संवाद था

लगभग मद्धिम कूचियों में सरकता हुआ संवाद

जिसमें बार बार विश्वास हो रहा था

कि जब कभी उदासी के गहन अंधकार के बाहर निकलने की बात उठेगी

जो कि उठेगी ही

बहुत याद आयेंगे ये कलाकार

काशी कैनवस के ये कलाकार 

गंगापार

छाटपार ।

 

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